वायु प्रदूषण के प्रति जागरुक करेगा डी डी एम ए, घटेगा कोविड का जोखिम


वायु प्रदूषण के प्रति जागरुक करेगा डी डी एम ए, घटेगा कोविड का जोखिम

हापुड़: सर्दी बढ़ने के साथ साथ कोहरे व शीतलहर के कारण वायु प्रदूषण बढ़ने लगता है। इसका मानव स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। कोविड 19 का सामना हम कर रहे हैं। बढ़ता वायु प्रदूषण कोविड 19 का भी जोखिम बढ़ा सकता है। कोविड 19 समेत सभी प्रकार के जोखिम को कम करने के लिये जिला आपदा प्रबंध प्राधिकरण (DDMA ) हापुड़ पूरी प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय है। डीडीएमए की अध्यक्ष व जिलाधिकारी अदिति सिंह की कोशिश है कि सभी प्राकृतिक व मानवीय खतरों का जोखिम हापुड़ के आम जनमानस पर कम से कम हो। उसके लिये स्ट्रक्चरल और नॉन स्ट्रक्चरल व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। डीडीएमए के सचिव व अपर जिलाधिकारी जयनाथ यादव की कोशिश है कि डी डी एम ए अध्यक्ष के निर्देशों के अनुरुप जोखिम को कम करने के लिये जिले में प्रभावी व्यवस्था की जाये। जिला आपदा प्रबंध प्राधिकरण की ओर से कोविड के जोखिम को कम करने के लिये मास्क का प्रयोग, दो गज की भौतिक दूरी, सेनेतैजेशन, व्यक्तिगत व पर्यावरणीय स्वच्छता पर जोर दिया जा रहा है। लोगों को जागरुक भी काफी समय से किया जा रहा है। जिला आपदा प्रबंध प्राधिकरण ने बदलते मौसम में वायु प्रदूषण के खतरे को कम करने के लिये लोगों को जागरुक करना शुरु कर दिया है। लोगों को वायु प्रदूषण के प्रति जागरुक करने के लिये शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया गया है। शिक्षकों के माध्यम से वायु प्रदूषण से बचाव का संदेश हर घर तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। शिक्षा व स्वस्थ्य विभाग के अलावा अन्य विभागों को भी वायु प्रदूषण के प्रति स्वयं जागरुक होने और अन्य लोगों को जागरुक करने के लिये कहा गया है। डीडीएमए का मानना है की लोग ठीक से जागरुक हो जायें ति स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव नही पड़ेगा। कोविड 19 का जोखिम भी घटेगा। ये हैं वायु प्रदूषक: 1- कार्बन मोनो ऑक्साइड (co): मनुष्य इसे सांस द्वारा बाहर निकालता है। यह मानव शरीर की आक्सीजन वहन की क्षमता को प्रभावित करता है। हृदय, फेपड़े के मरीजों व गर्भवती महिलाओं पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। कार चलाने की क्षमता भी इससे प्रभावित होती है। यह रक्त के साथ प्रतिक्रिया करके कार्बोक्सी हीमोग्लोबिन (cohb) पैदा करता है। एक प्रतिशत से कम cohb होने पर कोई लक्षण नहीं दिखाई देता है लेकिन एक से दो प्रतिशत होने पर तनाव, हलका सिर दर्द, तीन से चार प्रतिशत होने पर तेज सिर दर्द, कमजोरी, नीद आना, आंखों से कम दिखना, चार से पांच प्रतिशत होने पर पल्स रेट में वृद्धि , मिर्गी आ सकती है, श्वांस लेने की दर मंद होना और कोमा में जा सकता है। पांच से छह प्रतिशत होने पर मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है। कुछ घंटों में दम तोड़ देता है। 2- नाइट्रोजन के आक्साइड: इससे अस्थमा रोगियों को परेशानी होती है। फेफड़े प्रभावित होते हैं और श्वांस लेने में दिक्कत आती है। खांसी और गला खराब हो जाता है। 3- सल्फर के आक्साइड: इससे श्वसन नली की श्लेषमा झिल्ली में जलन होती है। इससे ब्रानकाइटिस हो सकता है। बारिक कण फेफणों तक पहुंच जाते हैं और नुकसान पहुंचाते हैं। 4- सीसा (लेड) : सीसा श्वांस के जरिए मनुष्य के अंदर जाता है। इससे थकान, सिरदर्द, भूख का न लगना और मांसपेशियों में दर्द के रूप में सामने आता है। सीसा रक्त निर्माण तंत्र, तंत्रिका तंत्र और गुर्दे को प्रभावित करता है।

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