बुजुर्ग नेता किनारे-युवा नेता छोड़ रहे साथ, कांग्रेस के कैसे आएंगे अच्छे दिन


बुजुर्ग नेता किनारे-युवा नेता छोड़ रहे साथ, कांग्रेस के कैसे आएंगे अच्छे दिन

कांग्रेस का राजनीतिक संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. कांग्रेस का जनाधार सिमटता जा रहा है और संगठन बिखरा सा नजर आ रहा है. इतना ही नहीं कांग्रेस में बुजुर्ग नेता साइडलाइन हैं तो युवा नेता अपने सियासी भविष्य को लिए चिंतित हैं. ऐसे में राहुल गांधी के करीबी युवा नेता पार्टी का साथ छोड़कर दूसरे दलों का हाथ थाम रहे हैं. अशोक तंवर, जितिन प्रसाद और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद सुमिष्ता देव ने भी कांग्रेस को अलविदा कह दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस के अच्छे दिन कैसे आएंगे? कांग्रेस को अलविदा कह सुष्मिता देव ने सोमवार को ममता बनर्जी की टीएमसी में शामिल हो गई हैं. असम से आने वाली और मूल रूप से बंगाली सुष्मिता देव के पिता स्वर्गीय संतोष मोहन देव पांच बार सिलचर सीट के अलावा दो बार त्रिपुरा पश्चिम सीट से भी लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. सुष्मिता देव का कांग्रेस छोड़ना राहुल गांधी के लिए सियासी तौर पर बड़ा झटका माना जा रहा है. सुष्मिता को राहुल का करीबी समझा जाता था. राहुल गांधी ने ही उन्हें महिला कांग्रेस की कमान दी थी. सुष्मिता देव काफी समय से कांग्रेस में असहज चल रही थीं. असम विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनके पार्टी छोड़ने की चर्चाएं उठी थी, लेकिन उस समय उन्हें मना लिया गया था. सुष्मिता देव ने सोमवार को कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दिया, जिसके बाद टीएमसी की सदस्यता ले ली है. टीएमसी में शामिल होकर सुष्मिता बराक वैली में ममता बनर्जी के सहारे बंगाली पहचान की राजनीति को मजबूत करने की कोशिश करेंगी. माना जा रहा है कि टीएमसी उन्हें त्रिपुरा प्रभारी के तौर पर नियुक्त कर सकती है. सुष्मिता देव कांग्रेक के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी टीम की पहली नेता नहीं है, जिन्होंने पार्टी को अलविदा कहा है. सुष्मिता से पहले अशोक तंवर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, प्रियंका चतुर्वेदी, राम्या और खुशबू सुंदर ने कांग्रेस छोड़कर दूसरे दलों का दामन थामा है. सिंधिया ने पिछले साल अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी की दामन थाम लिया था, जिसके चलते मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई और बीजेपी की सरकार में वापसी हुई. सिंधिया मोदी कैबिनेट में शामिल हो गए हैं. जितिन प्रसाद भी हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है. जितिन यूपीए सरकार में मंत्री रहे हैं और राहुल के करीबी माने जाते थे, जिनके जाने से कांग्रेस को यूपी में सियासी तौर पर झटका लगा है. ऐसे ही तमिलनाडु से आने वाली खुशबू सुंदर ने भी कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली है. दिव्या स्पंदना उर्फ राम्या कांग्रेस शोसल मीडिया की इंचार्ज रही हैं और राहुल गांधी की करीबी नेताओं में गिनी जाती थीं. प्रियंका चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रवक्ता रही हैं और राहुल गांधी की करीबी नेताओं में गिनी जाती थी. 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रियंका चतुर्वेदी ने कांग्रेस को अलविदा कह कर शिवसेना का दामन थाम लिया था. शिवसेना ने राज्यसभा सदस्य उन्हें बना दिया है. ऐसे ही हरियाणा से आने वाले अशोक तंवर भी राहुल के करीबी नेताओं में माना जाता था, लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ छिड़ी सियासी वर्चस्व की जंग में उन्होंने पार्टी को अलविदा कह दिया था. कांग्रेस छोड़ने वाले युवा नेताओं में सुष्मिता देव का नाम भी शामिल हो गया है. सुष्मिता देव को प्रियंका गांधी के करीब भी माना जाता था. बीते लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी उनके लिए प्रचार करने सिलचर पहुंची थीं. वहीं, राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच अभी तक सुलह नहीं हो सका है, जिसके चलते पायलट खेमा नाराज है. ऐसे में अगर पार्टी राजस्थान में सुलह का फॉर्मूला नहीं निकालती है तो पायलट का पार्टी से मोहभंग होने में देर नहीं लगेगा. कांग्रेस में एक के बाद एक कई युवा नेताओं के पार्टी छोड़ने पर कपिल सिब्बल ने तंज कसा है. सिब्बल ने कहा, 'सुष्मिता देव, हमारी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा, जब युवा चले जाते हैं तो बूढ़ों को इसे मजबूत करने के हमारे प्रयासों के लिए दोषी ठहराया जाता है. पार्टी आगे बढ़ती रहती है. आंखें बंद किए.' सिब्बल कांग्रेस के जी-23 नेताओं को गुट में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के साथ-साथ संगठन में फेरबदल करने को लेकर सोनिया गांधी को पत्र लिखा था. कांग्रेस में गुलाम नबी आजाद सहित पार्टी के तमाम बुजुर्ग नेता साइड लाइन हैं. ऐसे में पार्टी के असंतुष्ट खेमा कई मौकों पर वो पार्टी की नीतियों को लेकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव अभी तक नहीं हो सका है जबकि राहुल गांधी को इस्तीफा दिए हुए ढाई साल हो गए हैं. कांग्रेस युवा नेता एक तरफ तो पार्टी छोड़ रहे हैं और दूसरी तरफ बुजुर्ग नेता किनारे कर दिए गए हैं. ऐसे में कांग्रेस के सामने सियासी संकट गहराता जा रहा है. हालांकि, राहुल गांधी ने एक कार्यक्रम में मैसेज तो दिया कि जो डर रहे हैं वे चले जाएं. कांग्रेस में संघ के लोगों और डरने वालों की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन पार्टी के सियासी संकट को खत्म करने के लिए आगे भी नहीं आ रहे हैं. राहुल तमाम मुद्दों पर मुखर है. राहुल गांधी मजबूत मोदी सरकार और भाजपा से लड़ने में कोई हिचक नहीं दिखाते वहीं पार्टी के अंदर कड़े फैसले लेने में वे हिचक जाते हैं. कांग्रेस के अध्यक्ष का पद संभालने के लिए राहुल गांधी आगे नहीं आ रहे हैं. इतना ही नहीं राज्यों में कांग्रेस में जारी गुटबाजी को खत्म करने की दिशा में भी कोई कदम उठाते नजर नहीं आए. कांग्रेस जितनी कमजोर आज दिख रही है, उतनी कभी नहीं थी. ऐसे में कांग्रेस नेताओं का पार्टी छोड़कर जाना और बुजुर्ग नेताओं के किनारे किए जाने के बाद, कैसे पार्टी के अच्छे दिन आएंगे?

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